Sunday, December 5, 2010

काश!


काश!की हम इंसान भी पत्थर हो पाते
हर अहसास,हर जज़्बात को दूर हटा
सिर्फ और सिर्फ एक बुत से बन जाते,
पर क्या करें?आखिर हम इंसान जो ठहरे-
एक दिल और एक दिमाग जो रखते हैं ,
और इनमे ही तो सारे ख़यालात बसते हैं,
तो फिर ख़ुशी के साथ गम भी सहना होगा
आँसू पी कर,चुप भी कभी रहना होगा,
क्यूंकि-इनसे हम भाग तो न पाएंगे-
हाँ! गर भागे तो-
बस एक जिंदा लाश जरूर बन जाएंगे.........

Thursday, April 1, 2010

मौत की चाहत...


ज़िन्दगी तू मुझसे क्यों रूठती नहीं
क्यों दर्द देने में तुझे मज़ा आता है?
दम घुटता है, पल-पल मेरा सीने में
पर मौत को भी मुझपे तरस नहीं आता है,

यूँ तो टूट-टूट के खुद को समेटा है,कई बार
फिर नयी आस लिए खुद को किया भी तैयार
पर अब तो ऐसे टूटी हूँ-
कि,खुद को समेटा नहीं जाता है
बस मौत मांगती हूँ हर दुआ में
पर मौत को भी मुझपे तरस नहीं आता है,

खुद को खो दिया मैंने,क्या से क्या मैं हो गयी
आज अपना ही वजूद तलाशती हूँ, कैसी ये मेरी हालत हो गयी?
जिन आँखों से थी नमी दूर रही
उनका ही अश्कों से जुड़ गया नाता है
अब तो बस मौत ही मेरी आखरी हसरत है
पर उसको भी मुझपे तरस नहीं आता है.....