Saturday, June 27, 2009

क्यूँ?

क्यूँ दिल पर जमी धुंध छटती नहीं?
क्यूँ दिल पर रखा बोझ घटता नहीं?
क्यूँ दिल तरसता रहता है,सुकून को?
क्यूँ उलझनों का ताँता हटता नहीं?

चाहतें रखती हूँ,दिल में कितनी ही
हौंसले भी अपने बुलंद रखती हूँ
पर फिर भी न जाने क्यूँ?
उन्हीं चाहतों से घबराती हूँ
हौंसले बढ़ाकर उन्हें खुद ही गिराती हूँ
डर समा जाता है,न जाने कैसा?
उसी डर से भागना मैं चाहती हूँ

क्यूँ लगता है,कोई मुझे समझता नहीं
क्यों कोई मुझसे अपनापन रखता नहीं?
क्यूँ पत्थर दिल सब समझते हैं मुझे?
क्यूँ मेरे आँसू कोई देखता नहीं?

Wednesday, April 8, 2009

आवाम की चाहत

आवाम चाहती है, ऐसी सरकार
दे सके जो देश को मजबूत आधार
जिसकी योजनाए कागज़ी न हों
वो सब सच में हों साकार
जो गर मिटा न सके पर-
कम तो कर सके भ्रष्टचार
सड़क पानी बिजली की सुविधा के साथ
जो उपलब्ध करा सके बेहतर रोजगार
जो लड़ सके आतंकवाद से
दिला सके सुरक्षा का विश्वास
इनमे से आधी उम्मीदें भी जो हों पूरी
तो मान लो हो गए कुछ सपने साकार

Thursday, January 1, 2009

कुछ कतरे खुशियों के....


क्यों ग़म ही ग़म भर दिए हैं तूने-
मेरी इतनी सी झोली में
अब कुछ कतरे खुशियों के भी तू-
डाल दे मेरी झोली में
कब तक दिल पर पत्थर रख के
यूँ दर-दर की ठोकर खाऊं
क्या ग़म और रुसवाइयों के थपेड़ों से-
लड़ते-लड़ते ही मर जाऊं
जब चोट लगी हो गहरी-
तो फिर चहक कहाँ से हो बोली में
अब कुछ कतरे खुशियों के भी तू-
डाल दे मेरी झोली में
कब तक टूटी आसों को थामें-
दिन फिरने की राह तकू
जब तू ही न समझे हालत मेरी-
तो अब किससे फरियाद करूँ ?
स्याह हो गयी ज़िन्दगी से-
फीके लगते सब रंग होली के
अब कुछ कतरे खुशियों के भी तू-
डाल दे मेरी झोली में
क्या मेरी किस्मत में भी कभी-
आयेंगे दिन हँसी-ठिठोली के?
अब कुछ कतरे खुशियों के भी तू-
डाल दे मेरी झोली में.