
कहने को है,वो हमसफ़र मेरा
पर रास्ते मिलते नहीं हैं अपने
हम चल तो रहे हैं साथ-साथ
पर आज भी हम दूर हैं कितने
कल जो मेरे दर्द का गुबार फूटा था-
तो अंजाम वो देखा था मैंने
कि-अब तो हर कदम डर-डर कर-
रखते हैं,अपने ही हमदम की ज़िन्दगी में...
मेरे दर्द से वो होता भी है परेशान
पर हर बार वही तो-
मेरे दर्द की वजह बन जाता है
और बिना कसूर के ही वो-
मुझको सज़ा दिए जाता है
सज़ा मुझे अपनाने की,
सज़ा मुझे अपनी ज़िन्दगी में लाने की,
सज़ा मेरे करीब आने की चंद कोशिशों की.........