
क्यों ग़म ही ग़म भर दिए हैं तूने-
मेरी इतनी सी झोली में
अब कुछ कतरे खुशियों के भी तू-
डाल दे मेरी झोली में
कब तक दिल पर पत्थर रख के
यूँ दर-दर की ठोकर खाऊं
क्या ग़म और रुसवाइयों के थपेड़ों से-
लड़ते-लड़ते ही मर जाऊं
जब चोट लगी हो गहरी-
तो फिर चहक कहाँ से हो बोली में
अब कुछ कतरे खुशियों के भी तू-
डाल दे मेरी झोली में
कब तक टूटी आसों को थामें-
दिन फिरने की राह तकू
जब तू ही न समझे हालत मेरी-
तो अब किससे फरियाद करूँ ?
स्याह हो गयी ज़िन्दगी से-
फीके लगते सब रंग होली के
अब कुछ कतरे खुशियों के भी तू-
डाल दे मेरी झोली में
क्या मेरी किस्मत में भी कभी-
आयेंगे दिन हँसी-ठिठोली के?
अब कुछ कतरे खुशियों के भी तू-
डाल दे मेरी झोली में.
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