क्यों चाहते हो उसको-
जिसे तुम्हारे प्यार से सरोकार नहीं
क्यों देखते हो ख़्वाब ऐसे-
जो हो न सकेंगे साकार कभी,
ऐसा करने से आखिर क्या होगा-
बस दर्द ही तुम्हे हासिल होगा
जिसके हर ग़म को अपना मानते हो तुम-
क्या वो कभी तुम्हारी खुशियों में भी शामिल होगा?
क्यों जान कर भी अंजान बनते हो तुम?
जिसकी मंजिल ही नहीं,वही राह क्यों चुनते हो तुम?
जबकि खुशियों के फूल मिल सकते हैं तुम्हें-
फिर भी क्यों ग़म के काँटे चुनते हो तुम?
ग़र करनी है,ज़िन्दगी की मुश्किलें आसान-
तो भूल जाओ उसे
और ज़िन्दगी में जो जैसे मिले-
वैसे ही अपना लो उसे,
क्यूकि जिनके दिल ही नहीं-
उनपे प्यार का क्या होगा असर?
पत्थरों की इस दुनिया में-
जज्बातों की होती नहीं कदर
और तभी तो ख़वाब हकीकत से टकरा कर-
अक्सर जाते हैं बिखर ...............
Friday, November 7, 2008
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Awesome Dear....i don't even believe that you writes so good...very nice..
ReplyDeletethanks a lot sandeep...
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